Sunday November 19,2017

विमुद्रीकरण नगदी रहित कैशलेस अर्थव्यवस्था का सपना और समस्‍याएं

Published Dec 03, 2016 09:42:00   विवेक रस्‍तोगी  

विमुद्रीकरण के पहले से ही सरकार कैशलेस याने कि (नगदी रहित) कैशलेस अर्थव्यवस्था का सपना संजोये हुए थी। सरकार ने कैशलेस होने के बहुत से फायदे पहले भी बताए और विमुद्रीकरण के बाद कैशलेस होने की प्रक्रिया में गति आ गई है। विमुद्रीकरण से काले धन पर अंकुश लगने की पूरी संभावनाएं भी हैं। कैशलेस होने से अर्थव्यवस्था में तेजी तो आएगी लेकिन उस तेजी के लिए भारत को बहुत इंतजार करना है। कैशलेस होने के लिए बहुत सी समस्याएं भी हैं उनसे भी निपटना होगा और हर उस वर्ग को साथ लेकर चलना होगा जो केवल कैश पर ही भरोसा करता है।

भारत की 125 करोड़ की आबादी है जिसमें केवल 3 करोड़ क्रेडिट कार्ड हैं और 70 करोड़ डेबिट कार्ड हैं। कैशलेस को क्रियान्वयन करना ही बहुत बड़ा कार्य है, क्योंकि जारी कार्डों से अधिकतर को तो उपयोग ही नहीं किया जाता है, जितने भी लोगों के पास कार्ड हैं उनमें से बहुत कम ही लोग कार्ड का उपयोग कैशलेस के लिए प्रयोग करते हैं। अधिकतर डेबिट कार्ड का उपयोग केवल एटीएम से कैश निकालने के लिए ही किया जाता है। बहुत से लोग क्रेडिट कार्ड ले लेते हैं, लेकिन उपयोग कैसे करना है, पता नहीं होने से उपयोग नहीं करते हैं।

क्या जनता को तकनीक की जानकारी है : अभी हम भले ही मोबाइल वॉलेटस की बातें कर रहे हों जो कि उपयोग करने में बहुत आसान हैं, लेकिन उसके लिए भी स्मार्टफोन चाहिए। स्मार्टफोन भारत में लगभग 25 करोड़ हैं और जनधन खाते लगभग 22 करोड़ खोले गए हैं। लेकिन इससे ही हमें पता चलता है कि भारत में आर्थिक विभाजन है। भारत सरकार UPI (Unified Payments Interface) को कैशलेस में रामबाण औषधि बता कर प्रचारित कर रही है। लगभग किसी भी GSM फोन से जो आधार कार्ड से जुड़े हुए हैं UPI का उपयोग कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए सबसे पहले भारतीय जनता को नगद के मानसिक अवरोध से निकलना होगा। यह भी देखना होगा कि साधारण से GSM फोन से भी UPI को संचालित किया जा सके, क्योंकि कुछ फोन तो बहुत ही पुराने हैं और कई वर्गों का स्मार्टफोन रखने का बजट नहीं होता। अनपढ़ या थोड़ा बहुत पढ़ी लिखी जनता भी नई कैशलेस तकनीक का उपयोग बिना डर से कर पाएगी ?

ऑनलाइन लेनदेन सुरक्षित हैं : अभी तक के जितने भी मोबाइल वॉलेटस उपलब्ध हैं वे सब क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड या नेटबैंकिंग से ही चार्ज होते हैं, सरल शब्दों में कहें कि आपकी वित्तीय निजी जानकारी किसी के पास जा रही है और आम जनता इस जानकारी को देने में असुरक्षित महसूस करती है। इस ऑनलाइन के युग में सभी जानते हैं कि यह जानकारी कहीं न कहीं किसी न किसी सर्वर पर उपलब्ध होगी और देर सवेर किसी ने अगर हैकिंग कर ली तो फिर उनको लुटने से कोई नहीं बचा सकता है। कैशलेस ही भविष्य है, हर समस्या का समाधान है केवल बड़बोलेपन से काम नहीं चलेगा, इसके लिए हमें सुरक्षित उपाय भी लाने होंगे, जिससे आम जनता के बीच का डर खत्म हो। पिछले सालों में ही देखें तो सरकार के ही कई बैंक खाते हैक हो चुके हैं और कुछ दिनों पहले ही लाखों डेबिट कार्ड की जानकारी चुराये जाने का मामला प्रकाश में आया था और कई लोगों ने ऑनलाइन चोरी की शिकायतें भी दर्ज करवाई थीं।

क्या इसके लिए कोई नियम/कानून है : अगर सुरक्षा विषयों पर और भी कानून लाने की जरूरत है तो पारस्परिक भुगतानों के माध्यमों को जोड़ना उससे सरल होगा। अभी तक के रिजर्व बैंक के नियमों के मुताबिक हम एक मोबाइल वॉलेट से दूसरे मोबाईल वालेट को रकम नहीं भेज सकते हैं उदाहरण के तौर पर PayTm से Freecharge को आप रकम नहीं भेज सकते हैं और उसका उल्टा भी नहीं कर सकते हैं। अगर एक वालेट में हमने रूपया डाल दिया है तो समस्या यह है कि दूसरे किसी और वैलेट से हम उन पैसे का उपयोग नहीं कर सकते हैं एवं हमें वापिस से नया वालेट रिचार्ज करना होगा। रूपए में ही हम लेनदेन करते हैं और भारत में एक रूपया ही कानून द्वारा मान्य मुद्रा भी है। हमारे नियामक को आगे आकर नए तरह के लेन देन के तरीकों पर बात करनी होगी, जिससे भारतीय आम जनता में विश्वास कायम हो और वे कैशलेस समाज का हिस्सा बन सकें। अभी अगर कोई ऑनलाइन फ्रॉड होता है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है यह तय नहीं है। अगर जांच पड़ताल के बाद पता चलता है कि वित्तीय संस्थान की सुरक्षा ही कमजोर है जिसके कारण कोई फ्रॉड हुआ है तो भी अभी वित्तीय संस्थान बच निकलते हैं और आम जनता को ही नुकसान उठाना पड़ता है। वित्तीय संस्थानों के लिए सुरक्षा में चूक पर नियम सख्त बनाने होंगे।

कैसे कैशलेस की सुविधा देने वाले पैसे बनाएंगे : बड़ी दुकानें, हायपर बाजार, बड़े रेस्टोरेंट, होटलों को क्रेडिट/डेबिट कार्ड से कोई समस्या नहीं है, बल्कि वे उस पर होने वाले शुल्क को वहन अपनी आमदनी से आसानी से कर लेते हैं। छोटे उद्यमी जैसे कि दूधवाले, सब्जीवाले, जूते ठीक करने वाले लोग कैसे इन शुल्कों को वहन कर पाएंगे, जहां उनकी आमदनी और लाभ भी कम है। हर कार्ड स्वाइप करने पर शुल्क देय होता है। छोटे उद्यमियों को सबसे पहले तो इलेक्ट्रॉनिक भुगतान के बारे में शिक्षित करना होगा और फिर उनको ये कैशलेस प्रणाली अपनाने के लिए शुल्क भी देने होंगे। लेकिन वे क्यों करें ? भविष्य में उनको फायदा क्या है? अभी तो विमुद्रीकरण के कारण पैदा हुए हालात में लगभग सभी लोग खुले पैसों की तकलीफ से जूझ रहे हैं। अभी कार्ड कंपनियों और मोबाइल वालेटस के द्वारा नगदी की कमी होने से व्यापारियों से थोड़े समय के लिए शुल्क नहीं लिए जा रहे हैं। जब यह नगदी की कमी की समस्या सुलझ जाएगी, तब क्रेडिट / डेबिट कार्ड कंपनियां और गेटवे अपने शुल्क फिर से लेने लगेंगे। फिर सरकार इस शुल्क वाले मुद्दे को कैसे सुलझाएगी, यह देखना भी बहुत जरूरी है।

उपयोग करने की भाषा : लगभग सारी मशीनें और सॉफ्टवेयर एप सभी अंग्रेजी भाषा में ही उपलब्ध थे। विमुद्रीकरण की घोषणा के बाद से ही मोबाइल वालेट कंपनियों को समझ में आया कि स्थानीय क्षेत्रीय भाषाओं का एप पर होना बहुत जरूरी है, तभी क्षेत्रीय व्यापारी वर्ग जो मोबाइल वालेट का उपयोग करना चाह रहे हैं, वे लोग भी जुड़ पाएंगे। सबसे बड़ी मुश्किल तो उन लोगों की है जिनका हाथ क्षेत्रीय भाषाओं और अंग्रेजी दोनों में ही कमजोर है। कमजोर तबका जिनको मोबाइल रखना भी महंगा साधन लगता है, उनको मोबाइल से बैंकिंग सोचना ही कठिन है। उनका गुजारा तो नगद से ही होता है और नगद के बिना उनका जीवन गुजारा बहुत ही मुश्किल है। निरक्षर वर्ग के लिए कैशलेस तो श्राप ही है, उनके लिये कोई भाषा ले आओ, उनको किसी न किसी की सहायता की जरूरत रहेगी ही। वे लोग जब बैंक का खाता तक खुलवाने में डरते हैं, बैंक का फॉर्म भरने के लिए किसी का मुंह ताकना पड़ता है, वे कैसे कैशलेस का उपयोग कर पाएंगे, यह तय करना भी सरकार की ही जिम्मेदारी है। सरकार को इस तरह की शिक्षा का प्रसार गांव-गांव में विभिन्न माध्यमों से करना होगा।

बुनियादी समस्याएं : कैशलेस कहना सुनना बहुत ही सरल लगता है, परंतु भारतीय जनमानस को धरातल पर बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन बुनियादी समस्याओं को सुलझाने के लिए भी रणनीति बनाना बहुत जरूरी है, यह केवल सरकार के बस की बात नहीं है, हर उस वर्ग के व्यक्ति को मैदान में उतरकर जिम्मेदारी लेनी होगी जो इन तकनीक के बारे में जानता है। मोबाइल के सिग्नल अभी भी कई जगहों पर उपलब्ध नहीं हैं और अगर हैं भी तो नेटवर्क का होना न होना सब बराबर है। सबसे पहले तो हर गांव को मोबाइल नेटवर्क से जोड़ना होगा और मोबाइल या वाईफाई के जरिये कम से कम 2जी तकनीक को तो पहुंचाना ही होगा, आजकल बहुत से एप 2जी पर भी अच्छे से चल रहे हैं, जिससे आम जनता नेट पर जुड़कर ऑनलाइन बैंकिंग तक पहुंच बना सके।

निरक्षर जनता जो बैंक में आज भी कोई फॉर्म नहीं भर पाते, वे किसी जानकार व्यक्ति से अगर मोबाइल से भुगतान करवा भी लें तो इसकी कोई गारंटी नहीं कि उनके साथ धोखाधड़ी न हो। अगर बैंकिंग मोबाइल से जुड़ी है और मोबाइल गुम हो जाए तो क्या हमारा कानून उस मोबाइल से होने वाले किसी भी बैंकिंग ट्रांजेक्‍शन को रोकने में सक्षम है। निरक्षर लोगों की बात छोड़ दें, अभी मेरे एक मित्र बता रहे थे कि उनका शेयर ब्रोकर अरबपति है और साल में 100 दिन अलग-अलग देशों में रहते हैं और बीएसई में उनका काफी नाम भी है। लेकिन आज तक वे NEFT, RTGS या किसी भी प्रकार की ऑनलाइन बैंकिंग का उपयोग नहीं करते, आज भी सारा लेनदेन केवल चेक के जरिये ही करते हैं, उनको हैकर्स पर ज्यादा भरोसा है बजाय बैंक की सुरक्षा प्रणाली के, इसलिए वे अपने किसी भी बैंक खाते को आनलाइन लाना ही नहीं चाहते हैं। अगर बैंक की चूक से, बैंक की सुरक्षा प्रणाली को धता बताकर कोई धोखाधड़ी करे तो क्या बैंक उसका हर्जाना ग्राहक को देंगे ? ऐसे तमाम प्रश्न आम जनता के मस्तिष्क में कौंधते रहते हैं। जब अरबपति को ऑनलाइन में भरोसा नहीं तो आम जनता कैसे ऑनलाइन बैंकिंग पर भरोसा करे? सरकार ने या किसी भी नियामक ने वित्तीय संस्थानों को इस प्रकार से निर्देशित भी नहीं किया है। अगर हैकिंग हो जाती है तो हमारी कानून व्यवस्था क्या इस तरह के मामलों को जांच पड़ताल करने में सक्षम हैं ?

आज भी डाकघर में जाकर पैसे निकालना बहुत ही कठिन कार्यों में से एक है, कैसे कर्मचारियों की मानसिकता को बदलेंगे। केवल डाकघर ही नहीं हर उस सरकारी विभाग की बात है जहां लेन देन का कार्य होता है, उनको केवल कंप्‍यूटर के प्रयोग करने में ही इतनी दिक्कत आती है वो लोग कैसे जल्दी से जल्दी इन नई तकनीकों को अपना पाएंगे। हर विभाग में तकनीक को बहुत जल्दी बदलना संभव नहीं है क्योंकि इन सबमें भारी भरकम लागत होती है।

(मोलतोल ब्यूरो; +91-75974 64665)




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