Sunday November 18,2018

मल्टी स्टेट क्रेडिट कोआपरेटिव सोसायटी पोंजी स्कीम का नया रूप

Published Aug 03, 2018 04:57:00   मोलतोल संवाददाता  

लेखिका : डॉ अर्चना

पोंजी स्कीम इस शब्द से पाठक जन अपरिचित नहीं होंगे फिर भी विषयारंभ से पूर्व थोड़ी चर्चा कर लेना ज़रूरी हैं। पोंजी स्कीम वह निवेश योजना है जो हवाई किले की तरह अवास्तविक होती हैI इसमें निवेशक को बाज़ार में प्रचलित मुनाफे की दर से कहीं अधिक दर से मुनाफा दिए जाने का भरोसा दिया जाता है और प्रारंभिक स्तर पर निवेश करने वालो को यह निवेश लाभ देता भी है, बस यही लाभ निवेशकों को खींचता हैं और उसके बाद योजना के संचालक योजना में कुछ फेर- बदल करके निवेश लौटाने की अवधि बढ़ाने लगते हैं और अपना मुनाफा इसमें से निकालने लगते हैं।

कुछ इसी तर्ज़ पर मल्टी स्टेट क्रेडिट कोआपरेटिव सोसायटी काम करती है। इन सोसायटियों का गठन तो सदस्यों की भलाई, कृषि के बिकाऊ एवं ऐसे ही दावों के साथ किया जाता है लेकिन गठन के कुछ समय उपरांत ही इनके संचालको के लिए ऐसे सोसायटी धन कमाने का जरिया बन जाती है और तब तक काम करती ही रहती है जब तक नए निवेशक इसमें जुड़ते चले जाते है और पुराने निवेशकों का अपना निवेश अंतिम रूप से बाहर नहीं निकाला जाता है। अब ज़रा किसी प्रसिद्ध मल्टी स्टेट क्रेडिट कोआपरेटिव की योजनाओं पर एक दृष्टि डालिए, दिए गए सभी तथ्य आप अपनी नज़दीकी मल्टी स्टेट क्रेडिट सोसायटी की शाखा में जाकर सत्यापित भी कर सकते है। ज़रूरत सिर्फ थोड़ी सी मेहनत ओर खुले दिमाग की है।

आकर्षक ब्याज दर जमा दी जाती है जो प्रचलित बैंक ब्याज दर से 6 फीसदी अधिक होती है वर्तमान में यह दर 12-13 फीसदी की दर से दी जा रही है। जमा करवाने वाले एजेंट /एडवाइजर को भारी कमीशन दिया जाता है। एक वर्ष की जमा अवधि पर यह कमीशन 4 फीसदी की दर से दिया जाता है एवं पांच वर्ष की अवधि जमा पर यह दर 20 फीसदी की दर से दी जाती है यानि अगर 1 लाख की जमा राशि 5 वर्ष हेतु दी जाए तो 20000 रुपए तो तुरंत एजेंट को कमीशन के रूप में दिए जाते हैं। यदि किसी संस्था को चलाने के खर्च का निर्वाह मात्र भी निकालना हो तो भी जमा राशि पर दिए गए ब्याज दर से क़र्ज़ पर लिए जाने वाले ब्याज की दर में 5 से 6 फीसदी का अंतर होना ज़रूरी है। जमा एवंथा कर्ज पर दिए गए और ली गई ब्याज दरों के अंतर को आप किसी भी बैंक शाखा में जा कर समझ सकते हैं।

अब आपके सामने ऐसा तथ्य लेकर आते है जो सामान्यत: जन साधारण को ज्ञात नहीं है लेकिन जिसको आप कभी भी सत्यापित कर सकते है यह तथ्य है :

ब्याज दर जिस पर मल्टी स्टेट कोआपरेटिव सोसायटी कर्ज उपलब्ध करवाती है यह दर है 24 फीसदी से 27 फीसदी प्रतिवर्ष जो कि किसी भी बैंक या प्रतिष्ठित एनबीएफसी द्धारा दिए जाने वाले ब्याज से दो गुणा या अधिक है। क्या यह तथ्य आप के गले उतर सकता है कि कोई व्यक्ति बाज़ार दर से दो गुणा दर पर ब्याज चुका कर ऋण लेगा? क्या यह मनुष्यों द्धारा किया जाने वाला सामान्य व्यवहार है? जब आपको ऋण लेना ही है और ऋण के लिए आपको कोई संपति, आस्ति या गारंटी भी देनी ही है तो वह कौन सी मज़बूरी है जिसकी वजह से आप बाज़ार में उपलब्ध सारे विकल्पों को ठोकर मार कर स्वेच्छा से दो गुणा ब्याज चुकाएंगे?

यह ऐसा सवाल है जिस पर वह कोई भी निवेशक नहीं सोचता, पूछता और ना ही सुनना चाहता है जिसने मूल धन 12-13 फीसदी के ब्याज लोभ में जमा करवाया था। यह वह सवाल भी है जिसे उन सभी एजेंटों का शोर भी दबाता है जो सोसायटी से भारी कमीशन प्राप्त करते हैं। इस सवाल को वे सभी मीडिया हाउस भी दबा देते हैं जो इस सोसायटी द्धारा दिए गए विज्ञापनों की आय से लाभान्वित होते हैं। तो फिर सवाल उठता है कि यदि कोई भी सामान्य व्यक्ति इतनी ऊंची दर पर ब्याज नहीं चुकाएगा तो यह ऋण कौन लेगा?

वस्तुतः यह ऋण इतने ऊंचे ब्याज दर पर ऑफर किया जाता है कि कोई भी इसे लेने के लिए नहीं आता। यह ऋण वास्तव में दिया जाता है सोसायटी के उच्च पदस्थ अधिकारियों द्धारा नियंत्रित प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों को या फिर ऐसे A.O.P. को जो किसी भी विधि द्धारा संचालित नहीं होते।

ऋण देने की शर्तों में ही यह प्रावधान प्राय: होता है कि ऋण चुकाने कि पहली किश्त एक वर्ष या अधिक समय बाद दी जाएगी और यह एक वर्ष कभी खत्म नहीं होता। एक वर्ष होने पर ऋण लौटाने की शर्तें एवं समय की अवधि फिर से बढ़ा दी जाती है और फिर कभी ऐसा नहीं होता कि वास्तविक वसूली की नौबत आए।

जहां ऋण देने वाली अन्य संस्थायें बैंक एवं एनबीएफसी या तो रिज़र्व बैंक के नियंत्रण में रह कर कार्य करती है या उन पर बाज़ार का नियंत्रण ही होता है। इन क्रेडिट कोआपरेटिव सोसायटी पर ना ही तो किसी नियामक का नियंत्रण है ओर ना ही बाज़ार का ही विशेष नियंत्रण है। वस्तुत: वर्तमान कानूनों के अनुसार तो इनकी गतिविधियां यदि अपने सदस्यों के हितो को पहुंचाने वाली हो जाएं तो कोई न्यायालय अथवा केंद्र सरकार भी वर्तमान क़ानूनी ढांचे के भीतर रहकर इन के विरुद्ध सरलता पूर्वक कार्यवाही नहीं कर सकती।

वर्तमान विधि के प्रावधानों एवं व्यापारिक बुद्धि के सभी मानदंडों का सोसायटी खुल कर उल्लघंन करती है जैसे कि रिज़र्व बैंक का यह स्पष्ट निर्देश सभी बैंको को है कि वे अपनी जमा के 65 फीसदी से अधिक भाग का ऋण बाज़ार में न द।, ऐसा इसलिए कि यदि जमाकर्ता अपनी जमा निकलवाने बैंक में आए तो बैंक नकदी की कमी से ना जूझे। इसी प्रकार एनबीएफसी पर भी रिज़र्व बैंक का पर्याप्त नियंत्रण रहता है। रिज़र्व बैंक के अलावा भी एनबीएफसी बाज़ार के नियमों के आधार पर ही चलती हैं एवं इस प्रकार के जोखिम नहीं उठाती। रिज़र्व बैंक के साथ इन पर कंपनी एक्ट के प्रावधान का भी नियंत्रण होता है। लेकिन कोआपरेटिव सोसायटी इस बात का कुछ भी ख्याल नहीं करती और लगभग सभी मामलों में अपनी जमा का 90 फीसदी से ज्यादा भाग ऋण में दे देती है। और ये ऋण दिया किसे जाता है? 24 से 27 फीसदी ब्याज पर यह कर्ज उन्ही कंपनियों को दिया जाता है जो सोसायटी के कर्ता-धर्ता लोगों के नियंत्रण में होती हैं।

ऋण देते समय ना तो कोई सिक्योरिटी ली जाती है ओर ना ही उसकी वसूली पर ध्यान दिया जाता है। यह कंपनिया ऋण प्राप्त करते ही उसे बड़ी निर्ममता से खर्च कर देती है और यह खर्च नितांत अपारदर्शी तरीके से होता है क्योंकि ये सोसायटीज मल्टी स्टेट होती है इसकी वजह से किसी राज्य विशेष की सरकार इन पर नियंत्रण नहीं कर पाती, क्योंकि वर्ष 2002 में एक पृथक कानून बना कर मल्टी स्टेट क्रेडिट कोआपरेटिव सोसायटी को राज्यों के नियंत्रण से निकाल कर केंद्र सरकार के नियंत्रण में ला दिया है। क्योंकि ये सोसायटी ना तो बैंकिंग कंपनी है ओर ना बैंकिंग फाइनेंस कंपनी जिन पर रिज़र्व बैंक, रजिस्ट्रार ऑफ कंपनी एवं बाज़ार के किसी नियामक का कोई नियंत्रण रहता हो, इसी वजह से ये अपना मनमाना काम करती है।

वर्तमान कानून इन पर नियंत्रण तो नहीं रख पाते लेकिन इन्हें मनमाना काम करने में सहायता ही देते है जैसे आयकर अधिनियम 1961 की धारा 80P इस धारा के अनुसार कोई को कोआपरेटिव सोसायटी यदि अपने सदस्यों को ऋण दे तो उसे ऋण देने पर ब्याज की जो आय होगी वह पूर्ण: रूप से कर मुक्त होगी। यह कानून इस भावना से लाया गया था कि कोआपरेटिव सोसायटी पर आयकर का बोझ ना पड़े। लेकिन इसी कर मुक्ति के प्रावधान के ऐसे गलत उपयोग ढूंढे गए जिनका कोई अंत नहीं। अब चूंकि ये सोसायटी अपनी उस आय पर किसी प्रकार का कर देने के लिए बाध्य नहीं है जिसे ये ब्याज से अर्जित करते है, ये सोसायटी बेखौफ होकर फर्जी मुनाफा दिखाती है। यहां तक कि वे ऋण जो डूब चुके हैं उन पर न प्राप्त होने वाले ब्याज को भी ये सोसायटी अपनी आय में मर्केटाइल लेखा पद्धति के सिद्धIन्तों के अनुसार आय चाहे वास्तविक रूप से प्राप्त हुई हो या न हुई हो लेकिन खातों के आधार पर उसे प्राप्त हुआ दिखाया जाता है।

इस पद्धति का प्रयोग कर ये सोसायटी अपने लिए फर्जी आय और मुनाफा दिखाती है क्योंकि आयकर एक्ट कि धारा 80P के प्रावधानों की वजह से ब्याज आय जितनी चाहे हो कर मुक्त ही रहेगी, वहीँ बैंक जो जनता की डिपॉजिट से ही चलते हैं, अपने करों के बोझ से दबे रहते हैं। इस प्रकार फर्जी मुनाफा दिखा कर ये सोसायटी चलती रहती है। इस फर्जी मुनाफे को ये सोसायटी अपने खाते में रिज़र्व के रूप में ट्रांसफर कर देती है। यह रिज़र्व मल्टी स्टेट कोआपरेटिव एक्ट 2002 में एक बहुत महत्वपूर्ण सुविधा देता है। इस एक्ट के अनुसार कोई भी सोसायटी अपने रिज़र्व की राशि से 10 गुणा तक राशि अपने सदस्यों से जमा के रूप में स्वीकार कर सकती है। उदाहरण के लिए यदि रिज़र्व 300 करोड़ है तो 3000 करोड़ रुपए जमा किए जा सकते है। इस प्रकार फर्जी रिज़र्व खातों में दिखा कर आम जनता से भारी मात्रा में जमा हासिल कर ली जाती है और फिर से दबने वाले कर्जों में लगा दी जाती है या ऐसे खर्चों में लगा दी जाती है जो बनावटी होते है ओर वास्तविक लाभ सोसायटी के कर्ता-धर्ता को देते हैं।

एक बार यह कुचक्र चलना शुरू हो जाए तो किसी भी प्रकार बंद होना मुश्किल है। इन सोसायटी के एजेंट भारी दबाव बना कर रखते है जिसकी वजह से कोई भी निवेशक शायद ही अपनी राशि परिपक्व होने पर बाहर निकालता है। क्योंकि कोई भी निवेशक धन बाहर नहीं निकालता, सोसायटी के लिए नकदी का संकट कभी खड़ा नहीं हो पाता, सिवाय इसके सोसायटी अपने कानूनों में यह प्रावधान कर देती है कि कोई निवेशक यदि अवधि पूर्ण अपनी निवेश राशि निकलेगा तो उसे जुर्माने के रूप में कुल राशि का 50 फीसदी भुगतना करना होगा। इस जुर्माने कि जानकारी निवेश करते समय निवेशक को नहीं दी जाती। उससे बस ऐसे सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करवा लिए जाते है जिसकी शर्ते महीन अक्षरों में छपी हो, जैसे ही राशि परिपक्व होती है, शर्तों के मुताबिक यदि आय उसी दिन जाकर उसे नहीं निकालते हैं तो वह फिर से लंबी अवधि के लिए सावधि जमा में बदल दी जाती है और कोई वास्तविक भुगतान निवेशक को प्राप्त नहीं होता है। निवेशक प्राय: इसी खुशफ़हमी में जीवन निकाल देता है कि उसका धन दो गुणा या तीन गुणा हो गया है लेकिन वह कभी वास्तविक धन का उपयोग नहीं कर पाता।

क्या केंद्र सरकार कोई जांच या हस्तक्षेप कर सकती है? वर्तमान कानून जो मल्टी स्टेट कोआपरेटिव एक्ट 2002 है केंद्र सरकार को कोई भी अधिकार यहां तक कि स्पेशल ऑडिट करवाने का भी नहीं देता फिर भी चाहे कितने भी ख़राब ढंग से ये सोसायटी काम करें। इस कानून कि धारा 77(a)(b)(c) के अनुसार केवल उसी सोसायटी की स्पेशल ऑडिट की जा सकती है जिसमें केंद्र या राज्य सरकार की 51 फीसदी या अधिक भागीदारी हो। इस प्रकार ऐसा कोई भी संरक्षण या नियंत्रण वर्तमान क़ानूनी व्यवस्था में नहीं है जिसके जरिये आम जनता द्धारा डिपोजिट कराई गई धन राशि का क्या हुआ, सही उपयोग हुआ या नहीं और कोष का प्रबंधन ठीक से हुआ या नहीं, उस पर कुछ किया जा सकें। वर्तमान चक्र को देखते हुए इसे आप एक महा घोटाला कह सकते हैं जो बढ़ता ही जा रहा है। इस बात कि सिर्फ आशा की जा सकती है कि पाठकगण समझदारी से काम लेंगें ओर अपनी गाढ़ी कमाई ऐसी मल्टीस्टेट क्रेडिट कोआपरेटिव सोसायटी में जमा नहीं कराएंगे।

(मोलतोल ब्‍यूरो; +91-75974 64665)





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