Wednesday July 26,2017

नोटबंदी से बंद हुए कमोडिटी के डिब्बा ट्रेडिंग अड्डे फिर शुरु

Published Mar 12, 2017   मोलतोल संवाददाता  

मुंबई। कमोडिटी एक्‍सचेंज के समांतार चल रही डिब्बा ट्रेडिंग 8 नवंबर 2016 को हुई नोटबंदी के बाद करेंसी संकट पैदा होते ही बंद हो गए थे। नगदी के अभाव और सरकार के कड़े कदमों से डिब्बा कारोबार यानि अवैध कारोबारी गतिविधियों को चलाने वाले भूमिगत हो गए और इस तरह का सारा कारोबार ठप्‍प हो गया था। लेकिन फिर से देश के अनेक शहरों में डिब्बा कारोबार शुरु हो गया है।

केंद्र सरकार द्धारा अब बैंक खातों से करेंसी निकालने को सुगम बनाते ही फिर से देश के कई शहरों में डिब्बा ट्रेडिंग शुरु हो गई है। कमोडिटी कारोबार में छोटी कमोडिटी को इसके लिए पहले की तरह निशाना बनाया जा रहा है एवं वास्‍तविक मांग और आपूर्ति के नियम की जगह धनबल के आधार पर सट्टा गतिविधियां बढ़ी हैं। कमोडिटी एक्‍सचेंजों में वोल्‍यूम काफी कम है एवं नोटबंदी के बाद इनके वोल्‍यूम में खास सुधार नहीं हुआ है जबकि एक्‍सचेंज के बाहर हो रहा वोल्‍यूम जो नोटबंदी से लगभग पूरा बंद हो गया था, फिर से तेजी से बढ़ रहा है।

सूत्रों के मुताबिक नागपुर, जोधपुर, श्रीगंगानगर, दिल्‍ली, मुंबई, इंदौर, बीकानेर, जयपुर, कोलकाता, अहमदाबाद, राजकोट, नासिक एवं सिरसा सहित अनेक शहरों में डिब्बा ट्रेडिंग शुरु हो गई है। कारोबारियों का कहना है कि यदि कमोडिटी एक्‍सचेंजों में मार्जिन घटा दिया जाए और इसे एकदम सामान्‍य कर दिया जाए तो डिब्‍बा कारोबार पर रोक लग सकती है। इसके अलावा ऐसे व्‍यवस्‍था आनी चाहिए कि मार्जिन बढ़ने की स्थिति में खड़े सौदे बढ़ा मार्जिन अदा नहीं कर पाने पर अपने आप कट जाएं। इसके अलावा अवैध सट्टे के लिए कानून व्‍यवस्‍था काफी लचर है। आरोपियों को दो घंटे के अंदर जमानत मिल जाती है एवं वे बाहर आ जाते हैं। हालांकि, मुकदमा चलता रहता है जिसके नतीजे भी सुखद नहीं आते।

बीकानेर के फड़ बाजार में एक ऐसे ही मामले में 2003 में छापा पड़ा था जिसमें 17 लोग पकड़े गए और सभी दो घंटे के भीतर जमानत पर छूट गए, हालांकि, मुकदमा अभी भी चल रहा है। बीकानेर के इतिहास को देखें तो इस शहर में सटटे का इतिहास 400 साल पुराना है। देश में सबसे ज्‍यादा डिब्‍बा कारोबार क्रिकेट में होता है जबकि दूसरे नंबर पर चुनाव और तीसरे नंबर पर मानसून पर होता है। इतिहास उठाकर देखें तो देश में इस तरह का कारेाबार कोई नई बात नहीं है बल्कि बरसों से ऐसा होता आया है।

क्रांतिदूत वेबसाइट के मुताबिक जहां रजिस्टर्ड ब्रोकर अपने निवेशक और कमोडिटी या स्टॉक एक्सचेंजों के बीच एजेंट का काम करता है, वहीं डिब्बा चलाने वाला अपने आप में एक पूरी संस्था होता है। वह अपने ग्राहकों द्वारा किए जाने वाले सौदों को केवल अपने रजिस्टर में दर्ज करता है, उसके आगे ये सौदे एक्सचेंज या बाजार तक नहीं पहुंचते। उसी के स्तर से इन सौदों का निपटारा हो जाता है। इसमें मुनाफे का आकर्षण इतना अधिक होता है कि लालच के वशीभूत लोग इस गैरकानूनी कारोबार के प्रति आकर्षित हो जाते हैं। सवाल यह है कि आखिर क्यों लोग इस गैरकानूनी कारोबार के प्रति आकर्षित होते हैं। इसकी एक वजह यह है कि न तो इसमें टैक्स लगता है और न ही इसके लिए केवाईसी की जरूरत होती है।

ऐसे होती है यह ट्रेडिंग: पंजीकृत ब्रोकर अपने निवेशक के सभी सौदे शेयर बाजार नियामक ‘सेबी’ (या वायदा आयोग नियामक ‘एफएमसी’) और एक्सचेंजों के नियमों के हिसाब से निबटाता है, जबकि ‘डिब्बा ट्रेडर’ अपने स्तर से ही सब कुछ निबटा देता है। इस ट्रेडिंग की खास बात है कि किसी भी तरह की नकदी के जरिए इस खेल में हिस्सा लिया जा सकता है और कई गुना फायदे के लालच में लोग इसके प्रति आकर्षित हो जाते हैं। जानकारों का मानना है कि इस खेल में काले धन का भी काफी इस्तेमाल होता है। यही नहीं, ‘डिब्बा’ चलाने वाले लोग अपने खास ग्राहकों को कम से कम मार्जिन पर अधिक से अधिक ट्रेडिंग करने की छूट देते हैं। लोग लालच में पड़ जाते हैं और अपनी सीमा से बाहर जाकर ट्रेडिंग कर लेते हैं। ऐसे में अगर दांव उल्टा पड़ा, तो उन्हें भारी नुकसान भी सहना पड़ता है। हालांकि सेबी और अन्य रेगुलेटर्स ने इसे रोकने के प्रयास जरूर किए हैं, लेकिन अभी तक उन्हें इसमें कामयाबी नहीं मिली है।

(मोलतोल ब्‍यूरो; +91-75974 64665)




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